जाति न पूछो अपराध की,, गिन लीजिए वोट

Updated on 16-05-2022
                    
 बचपन से एक बात सुनते आए "जाति न पूछो साधु की, पुछ लीजिए ज्ञान", ठीक यही किया, तो इतना समझ आया कि, साधु यानि सामाजिक और शासन के रीति - नीति, नियम से जीवन जीने वाला सीधा सादा व्यक्ति, जो इन्हें तोड़ने की चेष्टा नहीं करता। पूरा का पूरा जीवन  बीत गया, ऐसे व्यक्तियों से ज्ञान लेते, सभी गुरुजनों को भी साधु मानकर जितनी भी पा सके, शिक्षा पाई। इसके अतिरिक्त देश की वर्तमान परिस्थितियां भी बहुत कुछ सीखा रही हैं।*
           वर्तमान में देश अजीब से दौर से गुजर रहा है, जहां बलात स्थापित किया गया है कि,आतंकी और अपराधी की कोई जाति नहीं होती, जबकि, अपराधी पर कार्यवाही हो तो, हंगामा बरपा हो जाता है, देखो देखो दुनिया वालों, अपराधी की जाति देखकर कार्यवाही की जा रही है।

           आखिर, ये कैसा पाखंड है? ये आता कहां से है? कौन लोग हैं, जो ये फैला रहे हैं? इसके फैलाने का क्या उद्देश्य है?
               ये कुछ यक्ष प्रश्न हैं, जिसका जवाब देश की जनता को मुखरता और निडरता के साथ , ऐसा पाखंड फैलाने वालों से पूछना चाहिए। हां, ऐसा सवाल अभी नहीं पूछा गया तो कभी नहीं पूछा जा सकेगा, देखना, कहीं देर न हो जाए।
           देश में ऐसा जो भी हो रहा है, ये एक प्रयोग ही हैं, याद करें, शरजील इमाम का चिकन नेक के संबंध में देश तोड़क बयान। अभी अभी मध्यप्रदेश राज्य के गुना जिले के आरोन थाना क्षेत्र में काले हिरण और राष्ट्रीय पक्षी मोर का शिकार करने वाले अपराधियों और उनके साथियों ने इस अपराधी कृत्य को रोकने का प्रयास कर रहे पुलिस वालों को गोलियों से भून डाला। वे शिकारी और उनके अपराध के साथी सभी ऐसे समाज से आते हैं, जिनकी जाति नहीं पूछी जा सकती है, पर उनके विरुद्ध की गई कार्यवाही उनकी जाति के कारण की जा रही है, ये पाखंड जरूर बनाया जायेगा।

 ये देश के सबसे शांत माने जाने वाले प्रदेश में व्यवस्थाहीन आदिम युग की आहट है, जहां अपराधी, जिनकी जाति नहीं पूछी जा सकती, बेखौफ होकर सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते दिखाई देते हैं। सामान्य जन समझ ही नहीं पा रहा है, कि आखिर हो क्या रहा है? एक तरफ पंजाब के मोहाली में पुलिस के खुफिया विभाग के मुख्यालय में राकेट हमला होता है, वहीं  मध्यप्रदेश के गुना जिले में पुलिस कर्मचारियों की इस तरह हत्या कर दी जाती है। कभी सेना या सीमा सुरक्षा बलों पर आतंकी हमले की जानकारी सारे देश को है, ये विदेशी आकाओं द्वारा देश में रह रहे समर्थकों की मदद से, देश को अस्थिर किया जाने का प्रयास होता था। कश्मीर में जब भी आतंक विरोधी कार्यवाही होती थी, तब स्थानीय पिट्ठू सुरक्षा बलों पर पथराव करते थे, ये भी सारा देश जानता है और देश के वामपंथी मीडिया का एक समूह, धर्मनिरपेक्ष, नरमपंथी, तुष्टिकारक, आतंकी अपराधी जाति वर्ग के मतों से सत्ता पाने के इच्छुक राजनैतिक दल इनके मानवाधिकारों की वकालत करने सामने आ जाते हैं। ये केवल भारत में ही संभव है, कि देश का सुप्रीम कोर्ट आधी रात को आतंकी के लिए न्याय के नाम पर खुले। ऐसा कोई ऐतहासिक कारनामा ध्यान में नहीं आता कि, किसी गरीब मजदूर के लिए कोर्ट ने ऐसा साहस दिखाया हो। ठीक, ऐसा ही जहांगीरपुरी सांप्रदायिक दंगों के आरोपितों के अवैद्य निर्माण हटाने पर प्रशासन के बुलडोजर को रोक दिया गया, सारे देश ने देखा। क्या, गरीब रेहड़ीवालों के अतिक्रमण हटाने पर माननीय को ऐसा कदम उठाया जाना चाहिए ?
         दिल्ली शाहीन बाग में अवैध निर्माण हटाने पर दिल्ली की आप सरकार के विधायक हंगामा कर रोक देते हैं, वहीं प्रिंस कालोनी के अतिक्रमण हटाने पर आप सरकार के विधायक नहीं जाते। देश में सड़क पर नमाज पर  कोई कार्यवाही नहीं, एक प्रदेश के मुख्यमंत्री के निवास के सामने हनुमान चालीसा का वाचन करने की घोषणा पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा, आश्चर्य है, ये केवल तालिबानी शासन में ही संभव है, और तथाकथित तत्व ऐसा ही मनसूबे जाहिर कर चुके हैं।
            देश सामाजिक व मानवीय स्तर पर भीषण संक्रमण काल से गुजर रहा है। देश के अंतर्राष्ट्रीय सीमा से लगे सभी प्रांत केरल, बंगाल, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, आसाम में मची सामाजिक, राजनैतिक उथलपुथल बहुत कुछ कहना चाहती है, किंतु देश का राष्ट्रवादी नागरिक मात्र सरकार के भरोसे है, कि इन सब समस्याओं से सरकार निबटे, सरकार का काम है, आखिर हमने सरकार बनाई ही क्यों है, कुछ भी हो, हमें तो बस सस्ता पेट्रोल, प्याज, टमाटर चाहिए। जबकि सरकार चुनने में देश की लगभग चालीस प्रतिशत जनता का कोई योगदान नहीं होता, वे मतदान दिवस को मताधिकार का उपयोग करने के बजाय पिकनिक बनाते हैं, पर उन्हें पूरी सरकारी सुविधा चाहिए, वो भी बिलकुल मुफ्त। वहीं दूसरी ओर पूरी तरह से संगठित मतदान करने वाला वर्ग मत देने के बदले बिना सजा के अपराध करते रहना चाहता है, और अगर उसे अपराध से रोका गया तो, वो पुलिस या सुरक्षा बलों पर सामूहिक जानलेवा हमला कर उन्हें मार देने में भी नहीं हिचकेगा, ऐसा प्रमाण देता रहता हैं। इसके बाद भी प्रशासन कानून का काम करे तो, वे विक्टिम कार्ड पर उतर आते हैं, हां, जाति तो पूछी ही नहीं जा सकती, बस, वे अपराधी रोजगार के अभाव में भटके, अशिक्षित लोग होते हैं, ज्यादा से ज्यादा कहना ही पड़ा तो, कानून अपना काम करे। जब कानून अपना काम करे तो, उसमें भी रोड़े अटकाने का काम धर्मनिरपेक्ष, नरमपंथी, वामपंथी, देश तोड़क तत्व निर्लज्ज रूप से करते हैं। यह वर्ग संगठित होकर मतदान करता है, अतः सत्ता लोलुप दलों का प्रियभाजन है, चाहे देश की हालत पाकिस्तान और श्रीलंका जैसी ही अराजक क्यों न हो जाए।

              देश की जनता को समझ लेना होगा कि, लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार को और उसके बनाए कानून को मजबूती देना जनता का काम है। केवल सरकार चुनने से अब काम नहीं चलने वाला। कभी भी मात्र कुछ सैकड़ा लोग सड़क पर उतरकर देश को हलकान नहीं कर सकते। देश तोड़क तत्वों ने  ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर दी हैं, वे अब सीधे सीधे देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था  पर खूनी हमला करने लगे हैं। जब तक देश की राष्ट्रवादी बहुसंख्या आगे आकर देश तोड़क अल्पसंख्या के शाहीन बाग, किसान आंदोलन, कानून वापसी के, दिल्ली लाल किला जैसे अराजक प्रदर्शन का मुखर विरोध नहीं करती, तब तक देश में शांति स्थापित नहीं हो सकेगी, और जनता भी शांति से नहीं रह पायेगी। अब कम से कम मात्र सरकार के भरोसे बैठे रहने से काम नहीं चलने वाला। देश में जनता ही तय करे कि, अपराधी की जाति भी पूछी जायेगी और उसके तुष्टिकारक राजनैतिक दल, पाखंडी देश तोड़क ताकतों से हिसाब भी मांगा जाएगा। 

               इस सब का यह मतलब कदापि नहीं है कि, देश की चुनी हुई सरकार देश हित का काम ठीक ढंग से नहीं कर पा रही है, सरकार का वैश्विक व आंतरिक स्तर पर कार्य बेहतर है, किंतु उसे भी देश की जनता की ओर से नैतिक शक्ति मिलना ही चाहिए, ताकि वो जनता द्वारा सौंपे गए दायित्वों का बेहतर निर्वहन कर सके।

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