अस्ताना: कजाकिस्तान के घास के मैदानों में 200 साल बाद दुनिया के आखिरी बचे असली जंगली घोड़े की वापसी हो गई है। इसी साल 22 अगस्त की सुबह कजाकिस्तान के स्टेपी इलाके में एक वाइल्डलाइफ सैंक्चुअली में 7 साल की प्रजेवाल्स्की घोड़ी ने बच्चे को जन्म दिया। यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम (UNEP) के अनुसार, जानकारों का मानना है कि यह शायद दो सदियों में इन घास के मैदानों में पैदा होने वाला पहला प्रजेवाल्स्की घोड़ा है। इसके ठीक 8 दिन बाद छह साल की घोड़ी उम्ब्रा ने एक और नर बच्चे को जन्म दिया।1969 में आखिरी बार मैदान में आए थे नजर
प्रजेवाल्स्की घोड़ों के जन्म ने इनके संरक्षण में जुटे कार्यकर्ताओं में बड़ी उम्मीद जगाई है। यह इसलिए भी खास है कि इन घोड़ों को कभी विलुप्ति के कगार पर मान लिया गया था। आखिरी बार ये घोड़े 1969 में गोबी के रेगिस्तान में खुले में घूमते हुए देखे गए थे। हाल ही में कजाकिस्तान ने इन घोड़ों के संरक्षण को लेकर प्रोग्राम शुरू किया गया है।यूरोप के चिड़ियाघरों से लाए गए कजाकिस्तान
2024 से अब तक 22 प्रजेवाल्स्की घोड़ों को यूरोप के चिड़ियाघरों से कजाकिस्तान के अलीबी रीइंट्रोडक्शन सेंटर में लाया गया है। 2029 तक यहां 40 घोड़े लाने की योजना है। प्रजेवाल्स्की घोड़ों को धरती पर बचे आखिरी असली जंगली घोड़ा कहा जाता है और प्रजाति बेहद दुर्लभ है।
प्रजेवाल्स्की घोड़ों के संरक्षण में जुटे अल्बर्ट सलेमगेरेयेव ने पहले घोड़े के जन्म की कहानी बताते हुए कहा कि उन्हें 22 अगस्त की सुबह सैंक्चुअरी से अपने एक साथी का फोन आया। वे कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना से 12 घंटे गाड़ी चलाकर अलीबी रीइंट्रोडक्शन सेंटर पहुंचे। उन्होंने बताया कि जब वे पहुंचे तो बच्चा अपनी मां के पास दुबककर बैठा था। उसके पैर अभी भी लड़खड़ा रहे थे।मेरे लिए बहुत यह बहुत भावुक पल ता। यह मेरे लिए सिर्फ एक और घोड़ा नहीं है। यह कजाकिस्तान में एक नई पीढ़ी की शुरुआत है।
अल्बर्ट सलमगेरेयेव, वाइल्डलाइफ कंजर्वेशनिस्ट
कैसे खत्म हो गई मध्य़ एशिया से आबादी?
कभी प्रजेवाल्स्की घोड़े बड़ी संख्या में मध्य एशिया के मैदानों में घूमा करते थे। उनके छोटे और मजबूत शरीर इस इलाके की कड़ाके की ठंड में शरीर की गर्मी बनाए रखने के लिए बहुत उपयुक्त थे। 1900 के दशक के बीच तक शिकार, खेती के चलने रहने की जगह खत्म होने और पालतू जानवरों से मुकाबले के चलते इनके झुंड खत्म हो गए। ये घोड़े यूरोप के चिड़ियाघरों में बचे रहे, जहां एक बड़े ब्रीडिंग प्रोग्राम ने इनके जेनेटिक पूल को सुरक्षित बनाए रखने में मदद की।