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पीएम मोदी डूबते जहाज पर दांव लगा रहे? UAE के साथ भारत की डिफेंस डील, विशेषज्ञ ने खड़े किए बड़े सवाल!

Updated on 20-05-2026
अबू धाबी/नई दिल्ली: मोदी सरकार ने खाड़ी देशों खासकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ काफी गहरे रिश्ते बनाए हैं। पीएम मोदी 15 मई को फिर से अबू धाबी पहुंचे थे और पिछले 12 वर्षों में यूएई की उनकी आठवीं यात्रा थी। इस दौरान पीएम मोदी ने यूएई के साथ रणनीतिक रक्षा साझेदारी के लिए एक ढांचा, अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के साथ एक MoU जिसके तहत भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों में 30 मिलियन बैरल तक तेल जमा किया जा सकेगा, LPG की आपूर्ति के लिए एक दीर्घकालिक समझौता और 5 अरब डॉलर के अमीराती निवेश का वादे जैसे समझौते किए हैं।

पीएम मोदी का विमान जब यूएई के एयरस्पेस में पहुंचा था तो यूएई के फाइटर जेट्स ने उसे एस्कॉर्ट किया जो एकजुटता का एक सुनियोजित और शानदार प्रदर्शन था। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बताया है कि भारत-यूएई के बीच रक्षा ढांचे में "रक्षा क्षेत्र में औद्योगिक सहयोग, नवाचार और उन्नत प्रौद्योगिकी पर सहयोग, प्रशिक्षण, सैन्य अभ्यास, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, सुरक्षित संचार और सूचनाओं के आदान-प्रदान" जैसे विषयों पर बातें हुई हैं। फिलहाल ये एक 'लेटर ऑफ इंटेंट' की भाषा है जो भविष्य की दिशा के बारे में है। अब संयुक्त कमान, हथियार ट्रांसफर, टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट और आपसी तालमेल के प्रोटोकॉल पर अभी बातचीत होना बाकी है।
हालांकि इसी साझेदारी के लिए एक 'लेटर ऑफ इंटेंट' पर जनवरी 2026 में UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायेद की भारत यात्रा के दौरान ही हस्ताक्षर हो चुके थे। ऐसे में 15 मई को पीएम मोदी के दौरे के दौरान जो बातें की गई हैं वो उस बात को औपचारिक रूप देने जैसा है जिस पर राजनीतिक तौर पर पहले ही सहमति बन चुकी थी। इसके अलावा इसके पीछे जियो-पॉलिटिकल संदेश है जिसके केन्द्र में सऊदी अरब और पाकिस्तान हो सकते हैं। कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत 'एक घटती हुई शक्ति' पर दांव लगा रहा है।

UAE से समझौता, क्या भारत 'डूबते हुए जहाज' पर लगा रहा दांव?

ईरान युद्ध से मिडिल ईस्ट दो हिस्सों में बंटता दिखाई देता है। एक तरफ अमेरिका के साथ इजरायल और यूएई खड़े दिख रहे हैं तो दूसरी तरफ ईरान के साथ चीन और रूस दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा इसके साथ एक उभरता 'इस्लामिक संगठन' है जिसे पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इन देशों का तेहरान के साथ नजदीकी है।
द वायर की एक रिपोर्ट में भारतीय वायुसेना के रिटायर्ड कर्नल आलोक अस्थाना ने लिखा है "भारत ने एक बार फिर खुद को इस समूह के साथ जोड़ने का फैसला किया है। यह न तो भूगोल का कोई संयोग है और न ही अर्थशास्त्र का। यह एक सोची-समझी राजनीतिक पसंद है और यह एक तय पैटर्न का ही हिस्सा है। भारत ने लगातार US-इजरायल-खाड़ी धुरी का समर्थन किया है भले ही इस धुरी को कई बार लड़खड़ाहट का सामना करना पड़ा हो।"

भारत पास मध्य-पूर्व में लगातार कम हो रहे विकल्प?

हालांकि आलोक अस्थाना की इन बातों से सबसे पहला सवाल जो जेहन में आता है वो ये कि क्या भारत चीन और रूस के खेमे में शामिल हो जाए? और दूसरा सवाल ये कि जब पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की जैसे देश इस्लामिक देश अपना गुट बना रहे हैं जिसमें कतर के भी शामिल होने की संभावना है तो फिर भारत के पास मध्य पूर्व में विकल्प क्या बचते हैं?ईरान युद्ध ने भारत की इसी सीमा को उजागर किया है जब दिल्ली ने ईरान पर हुए हमले की आलोचना में काफी देरी लगाई। ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर कई दिनों तक मौन बरती और कई दिनों के बाद ईरानी दूतावास में श्रद्धांजलि देने विदेश विभाग के सचिव को भेजा।

भारत बड़ा जियो-पॉलिटिकल मौका चूका या धैर्य का फल मीठा होगा?

ईरान युद्ध के बाद कई चीजें हो रही हैं या हुई हैं। जैसे अमेरिका के सामने ईरान पूरी ताकत के साथ टिक गया है, डोनाल्ड ट्रंप चीन से नजदीकी बढ़ा रहे हैं, सऊदी अरब चीन के साथ संबंध गहरा कर रहा है और सबसे ताजा नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स की बैठक थी जिसमें UAE और ईरान के के बीच गतिरोध पैदा हो गया। इसमें UAE ने इस बात पर जोर दिया था कि किसी भी घोषणापत्र में ईरान के हमलों की निंदा की जाए जो इस बात को उजागर करता है कि इस क्षेत्र में अब UAE को एक निष्पक्ष देश के बजाय एक पक्षपाती देश के रूप में कितनी गहराई से देखा जाता है।आलोक अस्थाना का तर्क है कि भारत को इसका फायदा उठाना चाहिए था और यूएई के साथ ऊर्जा संबंधों को बेहतर बनाते हुए रक्षा संबंध से बचा जा सकता था। भारत ईरान के साथ अपने संवाद को और गहरा कर सकता था जो भारत की कनेक्टिविटी से जुड़ी महत्वाकांक्षाओं (जैसे चाबहार बंदरगाह और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा) के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी बना हुआ है। वह खुद को एक सच्चे सेतु के रूप में स्थापित कर सकता था। लेकिन भारत ने ये मौका गंवा दिया।

क्या संयुक्त अरब अमीरात डूबता जहाज है?

कर्नल आलोक अस्थाना ने सवाल उठाया है कि क्या भारत डूबते जहाज पर सवार हो रहा है? उन्होंने तर्क दिया है कि पिछले एक साल में यूएई ने कई ऐसे फैसले लिए हैं जिनसे क्षेत्रीय स्तर पर इसकी साख को नुकसान पहुंचा है। पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) से इसके बाहर निकलने से सऊदी अरब इससे नाराज हो गया। अब्राहम समझौते की वजह से सऊदी और ईरान से दूरी हो गई है और यही वजह है कि ईरान संघर्ष के दौरान इजरायल से ज्यादा मिसाइल और ड्रोन हमले यूएई पर किए गये हैं। भारत में ब्रिक्स बैठक में भी कोई साझा बयान जारी नहीं हो पाया क्योंकि यूएई इस बात की जिद पर था कि उसपर हुए हमलों के लिए ईरान की निंदा की जाए। ज्यादातर देश इसके खिलाफ थे।उन्होंने लिखा है कि संयुक्त अरब अमीरात विदेशी मजदूरों पर निर्भर है। देश में 85 प्रतिशत से ज्यादा विदेशी मजदूर हैं। भोजन की आपूर्ति के लिए वो सऊदी अरब की जमीन का इस्तेमाल करता है और उसकी मुद्रा की कीमत भी लगातार गिरी है ऐसे में सिर्फ ऊंची-ऊंची इमारतें बनाने या संप्रभु धन से भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहा जा सकता। इसके अलावा UAE के पास "रणनीतिक गहराई" की कमी इसकी बुनियादी कमजोरी है। इसीलिए भारत जिसे अपनी रणनीतिक धैर्य और सभ्यतागत सोच पर गर्व है वो एक ऐसे साझीदार के साथ रक्षा ढांचा तैयार कर रहा है जिसकी अपनी दीर्घकालिक क्षेत्रीय स्थिरता पर अब लगातार सवाल उठ रहे हैं।

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