भ्रष्टाचार की राजधानी बना मध्यप्रदेश,क्या घोटाले ही अब बनेंगे पहचान

Updated on 23-06-2025
भोपाल/सी.एम दुबे –लगातार दो दशक से भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है मप्र में एक अदृश्य शक्ति कह लो या किस्मत जनता के मन मे अपनी पकड़ बना कर रखी है इसका नतीजा किसी के भी गले मे कमल का पट्टा डाल दो वह चंद दिनों में सीधे 50 लाख की गाड़ी हूटर लगाकर सड़को पर दौड़ाता दिख रहा।

जब खुली आंखों से संघठन और शासन ये देख रहा तो उसको पता है भृस्टाचार चरम पर है फिर भी कोई नसीहत नहीं कोई समझाइश नहीं क्योंकि रक्षक ही भक्षक बन गए।

मुख्यमंत्री मोहन यादव के पास खनिज विभाग है और खनिज से बेतहासा लूट डकैती डालकर कितने करोड़पति बन गए यह भी मुख्यमंत्री को पता है मुख्यमंत्री को यह भी पता है कौन मंत्री कौन विधायक रेत के धनदे में लगा है।पर सवाल यह उठता कि जब ठेकेदारों ने करोड़ों रुपये शासन में जमा किये तो उन ठेकेदारों को ही परेशान क्यों किया जा रहा उनके जांच नाके बन्द करवा दिए गए जहाँ खदान स्वीकृति नहीं वहां से अरबों की रेत बेंच ली और बरसात के पहले पहाड़ खड़े कर लिए।

मुख्यमंत्री को सब पता है पर क्या यह भविष्य के लिए सही है? इसका जवाब मुख्यमंत्री के पास नहीं है मुख्यमंत्री को उनके सलाहकार शायद यही कहते होंगे कि अपन को तो अपना उज्जैन ही सोने की खदान है इसके अलावा कही ध्यान नहीं देना इसलिए तमाम सूत्र रोज शिकायत कर रहे मीडिया प्रमाण दे रही फिर भी मुख्यमंत्री को यह नहीं दिखाई दे रहा जबकि अवैध खनन के जुर्माना से ही हजारों करोड़ की बसूली हो सकती जिससे शासन का राजस्व बढेगा।
संगठन की तो बात ही नहीं होती क्योंकि जिला अध्यक्ष अपने अपने पाठ्ठो को बना लिया तो जिला अध्यक्ष पद की गरिमा तो खत्म हो चुकी उनके दो चार जो खास है वह सभी अवैध कारोबार में लिप्त है।यहां एक बात और बता दु सत्ता के साथ कांग्रेसी भी मिलकर मौज कर रहे बराबर की कमाई कर रहे यही कांग्रेसी आगामी चुनाव में इसी रुपयो से मात देगे भाजपा को।

अब सवाल यह उठता कि जब चुनाव हुए थे तो मोदी की लहर में सब जीत गए लाड़ली बहना योजना से सब जीत गए पर आज भी हजारों गरीब परिवारों के पास खाने के लाले पड़े है आखिर यह केसी जन हित की सरकार है जनता की ही सुनवाई नहीं होती।

1250 रुपये लाड़ली बहनों को मिलते इसमें कई तो लखपति परिवार की बहने है 1250 देकर उनसे महीने का खर्च भी तो देख लो कितना ले रही सरकार ।एक दम वोटर बनकर रह गए नागरिक बनकर कोई नहीं सोच रहा।
किसानों पर कर्ज बढ़ता जा रहा फसल की लागत का मूल्य नहीं निकल रहा।

इस पर विचार नहीं किया जा रहा आखिर कब तक ऐसे लोकतंत्र चलेगा कभी तो रेत के बनाये महल ढह ही जायेंगे।

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