कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने एक रैली के दौरान कुछ ऐसा कह दिया कि BJP को एक बार फिर कांग्रेस को घेरने का मौका मिल गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता को लेकर की गई उनकी टिप्पणी पर विवाद हो रहा है। BJP कार्यकर्ता विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं और कांग्रेस अध्यक्ष से माफी की मांग की जा रही है। इस पूरे विवाद के बीच एक बार फिर यह सवाल है कि क्या विपक्ष ने पीएम की केंद्र में राजनीति के पिछले 12 साल से कोई सबक नहीं सीखा?सवाल सिर्फ खरगे के बयान या उनकी भाषा का नहीं है। सवाल यह भी है कि जब विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए मतदाता सूची, बेरोजगारी , महंगाई और दूसरे मुद्दे हैं, तो फिर उसकी राजनीति व्यक्तिगत टिप्पणियों के आसपास क्यों उलझ जाती है? ऐसे बयान सरकार से जुड़े सवालों को पीछे धकेलने का मौका ही देते हैं।विवादों वाली टिप्पणी
मोदी पर जब निजी हमला होता है तो उनके समर्थकों का एक वर्ग इसे सिर्फ प्रधानमंत्री की आलोचना के तौर पर नहीं, उनकी पृष्ठभूमि पर हमले के रूप में देखता है। लगभग हर बार आलोचना का उलटा असर हुआ है। पहले भी कांग्रेस के नेताओं के बयानों की वजह से BJP को आक्रामक होने का मौका मिला है। कभी मणिशंकर अय्यर , कभी दिग्विजय सिंह और कभी सैम पित्रोदा की टिप्पणियों पर विवाद हुआ। राहुल गांधी के बयानों को लेकर भी BJP ने कई बार कांग्रेस को घेरा है।जब कांग्रेस ने 'चायवाला' मीम साझा किया तो BJP ने इसे मोदी की पृष्ठभूमि का मजाक उड़ाने के तौर पर पेश किया। इसी तरह 'चौकीदार' जैसे शब्दों को भी उसने अपने राजनीतिक अभियान में शामिल कर लिया। मोदी की राजनीति का एक अहम पहलू यही है कि वह अपनी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि को राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाने में सफल रहे हैं। सामान्य परिवार से आने की उनकी कहानी उनके समर्थकों के बीच उनकी पहचान है।
बात समझ तो आई, लेकिन...
ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेस या दूसरे विपक्षी दलों को इस बात का अंदाजा नहीं है। पिछले कुछ चुनावों में मोदी पर सीधे निजी हमले पहले के मुकाबले कम दिखाई दिए हैं। विपक्षी नेताओं ने बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय, संविधान और संस्थाओं की भूमिका जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश की है। लेकिन, इस बीच कुछ बयान पूरी बहस को दूसरी दिशा में ले जाते हैं। जब बात व्यक्तिगत टिप्पणी तक पहुंच जाती है तो मूल मुद्दों के पीछे छूटने का खतरा रहता है।यह भी सही नहीं है कि राजनीतिक मर्यादा के सवाल सिर्फ विपक्ष के सामने हैं। BJP नेताओं की ओर से भी कई अवसरों पर विवादित और व्यक्तिगत टिप्पणियां की गई हैं। सत्ता पक्ष के किसी नेता का बयान जब उसकी पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा करता है, तब विपक्ष को उसे मुद्दा बनाने का अवसर मिलता है। लेकिन, विपक्ष ऐसे मौकों का इस्तेमाल उतने प्रभावी ढंग से नहीं कर पाता जैसा BJP कर लेती है। यह फर्क राजनीतिक संवाद को अपने पक्ष में मोड़ने की क्षमता का भी है।