आलोचना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, ये किसी की भी हो सकती है, ईश्वर, कोई धर्म, पंथ, शासक, विचारधारा इससे अछूती नहीं हो सकती। मात्र गुलाम अपने मालिक की आलोचना नहीं कर सकता, ऐसी परिस्थिति केवल और केवल अधिनायकवाद को प्रशस्त करती है, जो इक्कीसवीं सदी में संभव नहीं। कोई भी कथ्य अगर संदेहास्पद हो, अनर्गल हो, तो व्यर्थ की आलोचना कहा जा सकता है, किंतु जब तथ्यों के आधार पर कुछ कहा जाए, तो उसे समालोचना कहा जाता है।
हम अपनी बुद्धि से यह मान लेते हैं कि, मेरे साथ ऐसा कुछ हुआ, जो नहीं होना था, गलत हुआ, तो सबसे पहले ईश्वर को दोष देते हैं, और ये सत्य भी है। जब ईश्वर की आलोचना हो सकती है, तो उसके बनाए इंसान की आलोचना तो सहज ही है।
वर्तमान में भारत अपनी साढ़े तीन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से पांच ट्रिलियन डॉलर की और बढ़ती अर्थव्यवस्था की प्रतिबद्धता को लेकर वैश्विक आश्चर्य का विषय बना हुआ है। देश के सारे शत्रु परेशान, तो मित्र देश भी हैरान हैं। देश के लिए लाभदायक कई नए देश मित्र बने हैं, कई ने रक्षा, वाणिज्य, आई टी, इंफ्रास्ट्रक्चर, विज्ञान, ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व समझौते किए हैं, वहीं पुराने मित्रों ने हमारी प्रगतिशील नीतियों को सराहा है, मित्रता के लिए सार्वजनिक रूप से प्रतिबद्धता बताई है। कुल मिलाकर देश प्रतिष्ठा के एक नए रास्ते पर है।
विश्व के प्रमुख देशों में बार बार कहा जा रहा है कि, कोरोना काल में भारत का प्रदर्शन स्वागत योग्य रहा है। वहीं युक्रेन रूस युद्ध में शांति की दिशा में भारत की बड़ी भूमिका को भी स्वीकारा जा रहा है। युद्ध के दौरान विश्व में अनाज की कमी को देखते हुए, आई एम एफ तक भारत से अनाज पूर्ति की गुहार लगा चुका है।
सरकार और देश विरोधी संस्थाएं पूरी शक्ति से सरकार की आड़ में देश को नीचे दिखाने का कोई प्रयास नहीं छोड़ रहे हैं। भारत विरोधी देशी विदेशी ताकतें आश्चर्य चकित हैं कि, कैसे उनके भारत विरोधी सभी पाखंड एक के बाद एक धराशायी होते जा रहे हैं। चाहे वो सीएए के बहाने से किया गया, शहीनबाग हो या तीन कृषि कानूनों की बहाने से किया गया किसान आंदोलन, लालकिला कांड, दिल्ली दंगा, कर्नाटक का हिजाब कांड, फिल्म कश्मीर फाइल का बवाल, बंगाल, पंजाब के चुनाव बाद का, कश्मीर से 370 हटाने के बाद का माहौल, हिंदुओं की टारगेटेड किलिंग, हालिया कानपुर दंगा, राहुल का विदेशों में देश विरोधी सोचे समझे बयान जैसे कई कई मुद्दे से देश का सामना होते जनमानस ने देखा, समझा।
नुपुर शर्मा का बयान, इसी कड़ी का एक नया पाखंड है। इसके पूर्व कई कई वक्ता इससे भी बड़ी कटु बातें कह चुके हैं, किंतु कहीं कोई चूं तक नहीं हुई। अभी सोशल मीडिया पर जाकिर नाइक के कई वीडियो देखने में आ रहे हैं, जिनमें बिलकुल यही बात उसने कही है, पर सब मौन रहे, ये इस्लाम के ठेकेदारों की दोहरी मानसिकता से ग्रस्त होना बताती हैं। पुनः एक बार सिद्ध हुआ कि, इस्लाम छोड़ अन्य पंथ, संप्रदाय की आलोचना करना ऐसे तत्वों का संवैधानिक अधिकार है, और इस्लाम के एक अनुयाई वक्ता, जिसके हजारों इस्लामिक अनुयाई हैं, द्वारा कही बातों को ही अन्य द्वारा कहा जाना बवाल का कारण बना दिया जाता है।
मैने पहले भी कहा है, नुपुर के कथन को वैश्विक व व्यवसायिक कारणों से तुल दिया जा रहा है। भारत और ओ आई सी देशों में विशेषकर कतर से एक समझौते के तहत कतर द्वारा भारत को तय मूल्य पर तेल की आपूर्ति दस वर्षों तक की जाना थी। किंतु युक्रेन, रूस युद्ध के चलते रूस पर लगे, आर्थिक प्रतिबंधों के चलते, रूस ने यूरोप को तेल आपूर्ति रोक दी है। हालांकि कई यूरोपीय देश चोरी छुपे रूस से तेल खरीद रहे हैं। यूरोप के देशों को तेल आपूर्ति के लिए अमेरिका पर नाटो देशों का दबाव है। अमेरिका ने अपने पिट्ठू देश कतर, कुवैत, बहरीन आदि देशों पर यूरोप को तेल आपूर्ति के लिए दबाव बनाया, यह जानते हुए कि, इन देशों की भारत के साथ तय मूल्य पर तेल आपूर्ति का समझौता है। तेल आपूर्ति कर्ता देश ने भारत को समझौते से इतर नए बड़े मूल्यों पर तेल आपूर्ति का प्रस्ताव दिया, जिसे भारत ने समझौते का हवाला देकर इनकार कर दिया और रूस से उससे कहीं सस्ता तेल लेना शुरू कर दिया, जबकि रूस ने भारत की शर्तों और मूल्य पर पाकिस्तान को तेल आपूर्ति से मना कर दिया, जिससे पाकिस्तान और ओ आई सी के देश बौखला गए। सभी अरब देश कोरोना काल में भारत की मदद को भूल गए और पूर्व समझौते की शर्तों को तोड़कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते थे। भारत ने पुराने मित्र रूस के साथ कूटनीतिक चर्चा कर इसका रास्ता निकाल लिया जो अमेरिका परस्त देशों की हेकड़ी निकालने के लिए पर्याप्त सिद्ध हुआ। इसी दौरान भारत ने गेहुं के निर्यात पर रोक लगा दी थी, जबकि सारे विश्व में खाद्यान्न संकट है। वास्तविक युद्ध, युद्ध के मैदान से बाहर, छद्म रूप से लड़े जाते हैं। नुपुर के कथन का हंगामा, इस छद्म युद्ध का हिस्सा है, ये हमें समझना होगा।
सबसे बड़ी बात, अल कायदा द्वारा भारत में आत्मघाती आतंकी हमले की धमकी देना, इसके पीछे कारण, ठीक वैसे ही है, जैसे अतीत में देश में ही रहने वाले देश विरोधियों ने अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए सरकार बदलवाने हेतु, विदेशी आक्रांताओं को देश पर हमले का आमंत्रण दिया जाता रहा है। दूसरी तरफ देश में अमेरिकी राष्ट्रपति की उपस्थिति में दिल्ली दंगा और देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की उपस्थिति में कानपुर दंगा के रूप में प्रयोग किया जा चुका है, कश्मीर में टारगेट किलिंग, जो संभवत: बाहरी आतंकियों के बजाय अंतरिक आतंकियों द्वारा की जा रही प्रतीत होती हैं। देश की आम जनता को अब भ्रम में नहीं रखा जा सकता, ये देश में रहने वाली देश विरोधी ताकतें जान चुकी हैं, वे ये भी जानती हैं कि, धर्म के आधार मुस्लिमों को आसानी से भड़काया जा सकता है, अतः अब नुपुर शर्मा के कथन का पाखंड सामने लाया जा रहा है। सही मायनों में, यह कुतुहल का विषय बन गया है और इस देश के राष्ट्रवादी मुस्लिमों की परीक्षा की घड़ी है, कि इस पाखंड से निबटने में उनकी क्या भूमिका रहेगी? वे देश को सर्वोपरी मानते हैं, या ऐसे देश विरोधी पाखंड का साथ देते हैं, समय आ गया है, वे स्पष्ट हों, मुखर हों।