PoK में अलगाववाद भारत के लिए बड़ा मौका, कश्मीर पर खुल रही पाकिस्तान की पोल

Updated on 28-10-2026
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने एक बार फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार हमारी मदद नहीं कर सकती। हमारे पड़ोसी को देखिए, वह हर जगह कश्मीर का मुद्दा उठा रहा है। हालांकि, हकीकत यह है कि पाकिस्तान अपनी नाकामी को छुपाने के लिए जम्मू-कश्मीर की बात करता रहता है। मेरे ख्याल से पाकिस्तान बनाने का विचार शुरू से ही गलत परिकल्पना रहा है। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर मौजूदा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) सहित पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाया था। उन्होंने कहा भी था कि मैं पहले भारतीय हूं, फिर महाराजा।

शुरुआती विचार नहीं

पाकिस्तान के शुरुआती विचार से कश्मीर उसका हिस्सा नहीं था। 1930 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में मोहम्मद इकबाल ने अपने अध्यक्षीय भाषण में पंजाब, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बनाने की बात कही थी। उन्होंने तब उसे उत्तर पश्चिम भारत के मुसलमानों की नियति बताया था। उनके इस भाषण में न तो कश्मीर का जिक्र था और न ही बंगाल का। 21 जून, 1937 को मोहम्मद अली जिन्ना के साथ पत्राचार के दौरान इस राजनीतिक दर्शनशास्त्री की दिलचस्पी भारतीय मुसलमानों से जुड़े राजनीतिक सवालों की ओर दिखाई देती है।

अलगाववाद की आवाज

पाकिस्तान बनने के बाद जिन्ना ने बंगाली भाषियों पर भी उर्दू और अरबी औपचारिक रूप से थोप दी। इसका उन्होंने खूब विरोध किया। भाषा और राजनीतिक अधिकारों को लेकर लंबे संघर्ष के बाद 1971 में पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना। आज भी पाकिस्तान में अलगाववाद की आवाजें उठती हैं। सिंध में सिंधुदेश की मांग और बलूचिस्तान में आजादी की मांग इसके उदाहरण हैं। पाकिस्तान इन्हें दबाने की कोशिश कर रहा है। बलूच संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तानी हुक्मरान उनके संसाधनों का दोहन कर और उनकी पहचान दबा रहे हैं।

नाराजगी बढ़ी

खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में भी हालात बिगड़ रहे हैं। यह इलाका तहरीक-ए-तालिबान जैसे आतंकी संगठनों से जूझ रहा है। यहां के पख्तून भी लंबे अरसे से संयुक्त भारत या स्वतंत्र पख्तूनिस्तान की मांग करते रहे हैं। पाकिस्तान यहां भी कभी इस्लाम को खतरा, तो कभी सुरक्षा का हवाला देकर लोगों की भावनाएं खारिज कर देता है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में भी सैन्य दखल और सीमित नागरिक अधिकारों को लेकर नाराजगी बढ़ी है।

विरोध का कारण

आज PoK में लोग बिजली और सस्ते गेहूं के लिए प्रदर्शन नहीं कर रहे, बल्कि अब उनके विरोध का कारण शासन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संकट हो गया है। 2023 से शुरू हुए आंदोलन में जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) अहम भूमिका निभा रही है। जुलाई 2026 के चुनावों के दौरान 12 आरक्षित विधानसभा सीटों का विवाद भी आंदोलन की वजह बना। JAAC का आरोप है कि पाकिस्तान में बसे कश्मीरियों के लिए आरक्षित ये सीटें स्थानीय सरकार को प्रभावित करती हैं। वह इन्हें खत्म करने या बदलने की मांग कर रही है।

बेरोजगारी चुनौती

PoK में निर्वाचित सरकार होने के बावजूद उसके पास कई अहम फैसले लेने का अधिकार नहीं है। 2018 के संशोधन से प्रशासनिक और विधायी शक्तियां स्थानीय परिषद से मुजफ्फराबाद को मिलीं, लेकिन इसकी कमान भी पाकिस्तान सरकार के पास है। इसके अलावा, विकास के लिए आवंटित बजट भी 75 अरब से घटाकर 63 अरब रुपये कर दिया गया। ईंधन सब्सिडी के बजट में भी कटौती की गई। क्षेत्र में बेरोजगारी दर 11% है, जबकि महिलाओं में यह 23% और युवाओं में 27% है। सीमित अधिकारों और घटते बजट के बीच रोजगार और विकास बड़ी चुनौतियां बने हुए हैं।

उठे सवाल

इन विरोध-प्रदर्शनों ने सवाल उठाया कि जब बड़े फैसले इस्लामाबाद लेता है, तो PoK में स्थानीय स्वशासन का क्या मतलब है। भारत ने वहां नागरिकों की मौतों और सुरक्षाबलों की कार्रवाई पर चिंता जताई है। जून से अब तक कम से कम 90 लोगों की जान गई है। कुछ लोगों ने भारतीय तिरंगा लहराकर मदद मांगी। ये घटनाएं 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद के उस प्रस्ताव की याद दिलाती हैं, जिसमें PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान सहित उन क्षेत्रों पर भारत के दावे को दोहराया गया जिस पर पाकिस्तानी कब्जा है। भारत को अब पाकिस्तान के प्रोपेगैंडा को उजागर करना होगा, जिससे राजनीतिक प्रतिबद्धता पता चलेगी।

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