टाटा संस या टाटा ट्रस्ट्स? AGM को लेकर टाटा ग्रुप की कंपनियों के सामने पैदा हुई बड़ी मुश्किल
Updated on
28-09-2026
नई दिल्ली: टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस अगले एक महीने के दौरान एजीएम की योजना बना रही है। इसे लेकर ग्रुप की ऑपरेटिंग कंपनियों के सामने मुश्किल स्थिति पैदा हो गई है। टाटा संस के डायरेक्टर के तौर पर एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और होल्डिंग कंपनी के बोर्ड के बीच मतभेद अब सार्वजनिक हो गए हैं। ऐसे में इन कंपनियों को डर है उन्हें किसी एक पक्ष का साथ देने के लिए मजबूर किया जा सकता है।ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, इंडियन होटल्स कंपनी, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, टाटा पावर और टाटा केमिकल्स जैसी कंपनियों के सामने मुश्किल चुनाव है। या तो वोट करके किसी एक पक्ष का समर्थन करने का जोखिम उठाएं या फिर ऐसे विवाद से दूर रहें जिसके ग्रुप पर बड़े असर पड़ सकते हैं। लगभग 10 ऑपरेटिंग कंपनियों की टाटा संस में कुल मिलाकर 12.86% हिस्सेदारी है। इससे शेयरहोल्डर्स के जटिल गणित में उनके वोट अहम हो जाते हैं।टाटा ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी
टाटा संस के बोर्ड ने 17 सितंबर को एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के तौर पर दोबारा नियुक्त किया गया। उनका मौजूदा कार्यकाल आधिकारिक तौर पर अगले साल फरवरी में खत्म हो रहा है। नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का विरोध किया है। टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है।चंद्रशेखरन अक्टूबर 2016 में टाटा संस के बोर्ड में शामिल हुए थे और जनवरी 2017 में उन्हें कंपनी का चेयरमैन बनाया गया था। उन्हें डायरेक्टर के तौर पर दोबारा नियुक्त किए जाने की जरूरत है। इसकी वजह यह है कि टाटा संस के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के तौर पर उनकी भूमिका कानूनी रूप से बोर्ड में उनकी स्थिति बनाए रखने पर निर्भर करती है।क्या है पेंच?
एक सूत्र ने कहा, "यह गलत है कि ऑपरेटिंग कंपनियों को ऐसे मामले में घसीटा जा रहा है जो असल में ट्रस्ट्स और टाटा संस से जुड़ा है। यह ऐसी स्थिति है जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।" ग्रुप के जटिल क्रॉस-होल्डिंग स्ट्रक्चर का मतलब है कि कई ऑपरेटिंग कंपनियों और शेयरहोल्डर्स के हित वोटिंग के गणित का हिस्सा बन सकते हैं। इससे वे ऐसे गवर्नेंस विवाद में खिंच सकती हैं जिनसे वे बचना चाहेंगी।एक बड़ी कंसल्टिंग फर्म के फाउंडर ने कहा, "यह बहुत पेचीदा मामला है। मुझे लगता है कि अगर कंपनियों के फैसले को आखिरकार सिर्फ एक 'परसेप्शन गेम' के तौर पर देखा जाने वाला है, तो वे वोटिंग से दूर रहने पर भी विचार कर सकती हैं।" कंपनियों को आखिरकार अपने बिजनेस और शेयरहोल्डर्स के फायदे को ध्यान में रखकर ही काम करना होगा। ऐसे में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के पक्ष या विपक्ष में वोट देने को टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच के रिश्तों पर एक बड़े नजरिए के तौर पर देखा जा सकता है।मिसाल कायम करने का समय
टैक्स और एडवाइजरी फर्म KNAV के पार्टनर उदय वेद ने कहा, "नियम तो 'एक शेयरहोल्डर, एक वोट' का है, लेकिन इस बात पर कोई साफ राय नहीं है कि उस वोट को किस तरह देखा जाएगा। किसी भी फैसले को विवाद में किसी एक पक्ष का साथ देने के तौर पर देखा जा सकता है। साथ ही, कंपनी को अपने फायदे, ग्रोथ और शेयरहोल्डर्स का ध्यान रखना होगा और अपने बोर्ड और स्टेकहोल्डर्स के प्रति जवाबदेह भी रहना होगा।"
कंपनियों के लिए यह मामला एक मिसाल कायम करने का भी है। कोई पक्ष लेने से ऐसी उम्मीदें बन सकती हैं कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच भविष्य में होने वाले मतभेदों पर ऑपरेटिंग कंपनियों को कैसा रुख अपनाना चाहिए। माना जाता है कि वे यही चाहती हैं कि यह मामला टाटा संस के गवर्नेंस फ्रेमवर्क के अंदर ही सुलझा लिया जाए, न कि अलग-अलग कंपनियों को किसी एक पक्ष को चुनने के लिए मजबूर किया जाए।
एक बड़े एग्जीक्यूटिव ने कहा, "कंपनियों के लिए यहां किसी एक पक्ष का साथ देते हुए दिखना काफी शर्मनाक हो सकता है—क्योंकि एक पक्ष का समर्थन करने पर दूसरे पक्ष के नाराज होने का जोखिम है। इसलिए, कुछ कंपनियां वोटिंग से दूर रहने पर भी विचार कर सकती हैं।"
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